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गज़ल (....क्या हो चला हूँ मैं)

महज़ आइनों को ख़बर हुई कि क्या हो चला हूँ मैं ...पर किन्हीं खयालों को चेहरा मिलने से बस 'मैं ' हो चला हूँ मैं मैं और तू के फासलों से परे उतरना ......बस समंदर में वरना बूँद-बूँद ...और ..दरिया-दर...

कराह

तुम्हारी उम्रों के पैर थके हुए नजर आते हैं कि वो चल रही हैं सफर अपना, और बहुत लाज़मी भी है बातों का उसी तरह घटित होना जैसा कि उनको होना है तुम्हारे वहाँ होने से जहाँ कि तुम हो भल...

मुलाक़ात

मैं अपने हृदय को अम्बर के उस ताक पर शाम बीतते ही रख दूँगा जहाँ असंख्य हृदयों की अपार ऊर्जाएं मौजूद है जो मानवीय इतिहास की पहली सीढ़ी से अब तक सफर में हैं; फिर उनका प्रतिबिम्ब ...

असीम

मन के विस्तृत घुड़साल में घोड़ों का हिनहिनाना ठीक उसी तरह बेहद प्राकृतिक है जैसे कि दो किनारों के बीच नदी का साँस लेना, अगर हम अवचेतन के गहरे तलों में सबसे निचली सीढ़ी पर व्या...

गज़ल

खड़े हो बिजूके से.. क्यों कोई रंग नहीं दिखता? उदास शामों के साये में वो बेरंग नहीं दिखता। हां कि उतरकर पैमानों से परे अबकी हो जाएं कि फिज़ा-ए-आज में जमाने की बीता रंग नहीं दिखता। ...

लहू का गाढ़ापन

मैं उसके लब्जों के वेग को सह रहा था अपनी छाती पर, उसने कहा कि मेरी रगों में बहता हुआ लहू, बहुत गाढ़ा हो रहा है और इतना कि जान पड़ता है नशें फटने वाली हैं, इससे पहले कि ये फटें, इनमे ब...

राजनीति

यथार्थ है, ठीक उसी तरह जैसे कि आसमान जो कि मेरी जेबों के हर एक पहलू के साथ साथ मेरे जूते के अंदर भी है; कि चाँद का होना समुद्र के अस्तिव को प्रभावित करता है, तो सम्भव है कि इंसान...