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ओ साथी!

रात सुनाई पड़ रही है कुछ बोलती सी घटा खुद में घुले अश्कों को है तोलती सी बहुत ही हाँफकर क्यों हो डगर में आओ मैं हूँ साथ बैठो छाँव में ओ साथी! अधूरी अधूरी सी लगती है दुनिया न तेरी ...