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Showing posts with the label सुकून

याद।

कोई भी याद चली आती है आंखों में न जाने कहाँ रुकी होती हैं अपना डेरा डालकर किस घर में कौन सी जगह; उदास हवाओं के सहारे खच्चरों को खदेड़ने की याद हो धधकती दोपहर में जिंदगी को हां...

वो कुछ खयाल...

लड़खड़ाते सहारे बैशाखी के और उनको गले लगाकर चल रहे थे वो तमाम खयाल उलझनों के माथों को चूमते हुए जिनको खुद मैंने अपाहिज बनाया। जाने अनजाने अजनबी दास्तानों को साथ लेकर जेबो...

कि हाँ तुम ही तो...

कि हाँ तुम ही तो,  सबसे बेहतर साथ हो तुम मेरा, हर एक आरजू, हर मुलाक़ात ,हर जज्बात हो तुम मेरा। किसी भी फलक में तुमसे बातें सुकून का चेहरा दिखाती हैं, कि रूबरू हर रंग से ... और हर हालात ...

बिखरा है।

कि अंदर का वो शख्स कुछ उलझा हुआ सा है, जरूरत क्या है उसको बस बहका हुआ सा है। परदे बेशुमार डाले हैं झूट के बाहर से काले रंग के, अंदर कई बार नंगा नजर आता है सहमा हुआ सा है | बस साँसों ...