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ओ साथी!

रात सुनाई पड़ रही है कुछ बोलती सी
घटा खुद में घुले अश्कों को है तोलती सी
बहुत ही हाँफकर क्यों हो डगर में
आओ मैं हूँ साथ बैठो छाँव में
ओ साथी!

अधूरी अधूरी सी लगती है दुनिया
न तेरी न मेरी है किसी की न दुनिया
क्यों खलिश सी पालकर बैठे हो तुम
आओ मैं हूँ साथ बैठो पास मेरे
ओ साथी!

रिसते घाव हैं तो हैं मरहम हवाएं भी
खयाल उदास हैं तो हैं खुशनुमा फिजायें भी
क्यों अंगारों को ताकते रहते हो तुम
आओ मैं हूँ साथ कुछ बात कर लें
ओ साथी!

ये चाँदनी नहलाती है जेहन को उतरकर
और खामोशी गहनाती हुई आती हैं संवर कर
क्यों हमेशा शोर में रहते है तुम
आओ मैं हूँ साथ कुछ खामोशी उड़ेलें
ओ साथी।

10 जनवरी 2019
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'अनपढ़'

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