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न जाने कितने चेहरे...

ऐ चाँद
चांदनी भर नजर
मुझे दे दे
खुद को देखना है
कि दुनिया
बहुत देख ली
सूरज के उजालों में।

फैली है नफरत
हर जगह
बिखरा पड़ा है लहू
कि आदमी खाने लगा है
नोचकर आदमी को ही।

हर शाम थक हारकर
उड़ाती है धुआँ
मेरे साथ
कि बीत चुका
जो होना था आज
कल फिर हमें मिलना है।

खबर मिली है कि
बहा रही है
सब कुछ ये बाढ़
हां बाढ़ बनके चले होंगे
आदमी भी कभी।

कोई आईना तो
ला के दो
खुद को देख लूँ एक दफा
कि मैं भी घूमता हूँ
न जाने
कितने चेहरे लेकर।

26 अगस्त 2018
Copyright @ 'अनपढ़'

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Dr. Deepak Bijalwan
Poet, Translator