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हासिये पर...जिंदगी की ग़ज़ल

यूँ न जाना छोड़कर
         हासिये पर मुझे...,
कि जिंदगी की गज़ल,
         मुकम्मल होने देना।

कि एक मतला एक शेर,
          और एक मिश्रा ही तो हुआ है अभी,
जितनी बड़ी किताब-ए-मोह्हबत है हमारी,
          उतने शेर होने देना।

'अनपढ़'
9 अगस्त 2017

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